Saturday, 13 September 2014

संकल्प करें राजभाषा के लिये




     जिस तरह राष्ट्र ध्वज तथा राष्ट्र गान एक स्वतंत्र देश के गौरव के प्रतीक होते हैं उसी तरह राष्ट्र भाषा का भी एक अलग महत्व होता है। राष्ट्र भाषा को भी वही गौरव प्राप्त होना चाहिए। परन्तु हमारे देश में ऐसा नहीं है। हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है, लेकिन वर्षों बाद भी यह सरकारी काम-काज की भाषा नहीं बन पायी है। हम भारतवासी जो राष्ट्र भाषा से प्यार करते हैं हमेशा इसकी स्थिति से असंतुष्ट रहते हैं। अभी भी यह अंग्रेजी के सामने बौनी है। अपने देश में भी अंग्रेजी जैसी हैसियत इसे प्राप्त नहीं है।
   यह सर्वविदित है कि हिन्दी इस देश के जन-गण की भाषा है। यह पूरे देश में सर्वाधिक बोली, समझी, पढी और लिखी जाने वाली भाषा है। यह अनपढों, अहिन्दी भाषी द्वारा भी समझी और बोली जाती है। जब तक जन-गण की भाषा राज-काज की भाषा, शासकीय प्रयोजन की भाषा नहीं बन पाती, तब-तक जनता-जनार्दन की पहुंच शासन-प्रशासन में संभव नहीं है। और जब-तक जनता-जनार्दन की पहुंच शासन-प्रशासन में नहीं होती, तब-तक प्रशासन से लाभ साधारण जनों कों नहीं मिल सकता। अतः यह आवश्यक है कि शासकीय प्रयोजन की भाषा जन-गण की भाषा हो। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में राष्ट्रभक्त आंदोलनकारियों के मध्य हिन्दी राष्ट्रीय एकता के सबल सूत्र के रूप में कार्य कर रही थी। फलस्वरूप संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 को हिन्दी को राजभाषा के रुप में अंगीकार किया था। अतः प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को पूरे देशभर में हिन्दी दिवस मनाया जाता है।
    हिन्दी दिवस के दिन प्रत्येक भारतवासी जिसे हिन्दी की वर्तमान स्थिति से कष्ट है, जो हिन्दी को सम्मानित भाषा के रूप स्थापित देखना चाहते हैं, उन्हें हिन्दी के उत्थान के लिए सच्चे मन से संकल्प लेना चाहिए तथा निम्न तथ्यों को ध्यान में रखकर आगे बढना चाहिए ।
1)      चाहे आप सरकारी, गैर सरकारी संस्था में कार्यरत हों, किसी व्यवसाय से जुडे हों या किसी अन्य उद्यम से जुडे हो, छात्र हों य़ा शिक्षक हों, या चाहे आप साधारण जन ही क्यों न हो आप हिन्दी का प्रयोग तब-तक करते रहें जब तक कि अन्य भाषा का प्रयोग अति आवश्यक न हो।
2)      जहां तक संभव हो लिखने में शुद्ध हिन्दी का प्रयोग करें, यदि आपके पास समयाभाव हो या किसी अन्य कारण से शुद्ध हिन्दी नहीं सीख पा रहें हों तो जैसी हिन्दी आपको आती है वही ठीक है, उसी का प्रयोग करें। लेकिन यह बात स्मरण रहे कि अभी तक के जीवन में आपने जितना समय अंग्रेजी सीखने में बिताई है उसके कम से कम दसवें भाग के बराबर का समय हिन्दी सीखने में अवश्य दें।  
3)      युवा वर्ग या वे लोग जो टेक-सेवी हैं, जो मोबाईल, कम्प्युटर का प्रयोग अत्यधिक करते हैं उन्हें हिन्दी में ही संवाद का आदान-प्रदान करना चाहिए। यदि देवनागरी लिपि में टाईप करना कठिन लग रहा हो तो रोमन में ही टाईप करें, वैसे अब कम्प्युटर एवं मोबाईल में देवनागरी लिपि में टाईप करने की सुविधा उपलब्ध  हो गई है।
4)      हिन्दी में अभी तक बेस्ट बुक सेलर की परंपरा विकसित नहीं हुई है। चूँकि हर कोई लेखक तो बन नहीं सकता, परन्तु पाठक तो हर कोई बन सकता है। हमने अपने कई साथियों को देखा है कि वे सौ- दो सौ रूपये आनन-फानन में खर्च कर देते हैं, लेकिन वर्षों तक एक भी पुस्तक नहीं खरीदते। पुस्तकें पढनी हो तो वे पुस्तकालय से या किसी से मांग कर पढ लेते हैं। हमें यह आदत बदलनी चाहिए। हमें हर महीनें, तीन महीनें में, छः महीने में या वर्ष में कम से कम अपनी पसन्द की एक हिन्दी की पुस्तक अवश्य खरीदनी चाहिए।
5)      हमारे देश का मूल स्वभाव अनेकता में एकता है। अतः यह संभव है कि आप ऐसे जगह रह रहें हों जहां हिन्दी नहीं बोली जाती हो कोई अन्य भारतीय भाषा बोली जाती हो। ऐसी स्थिति में आप उस अन्य भाषा के प्रयोग को प्राथमिकता देते हुऐ यथासंभव हिन्दी का भी प्रयोग करें। कयोंकि अन्य भारतीय भाषा भी हमारे देश के सम्मानित नागरिक की मातृ भाषा है। अतः उनहेँ भी सम्मान दिया जाना चाहिये।
6)      हमारे कार्यालयों में कार्य करने वाले अधिकारी, कर्मचारी अंग्रेजी में कार्यकर व बोलकर स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं जबकि हिन्दी में कार्य करना उन्हें अच्छा नहीं लगता है। अतः आप सभी को इस हीन भावना से मुक्त होकर विश्वास के साथ रचनात्मक-प्रयोगात्मक मानसिकता विकसित करनी चाहिये। इससे सुन्दर हिन्दी का विकाश होगा तथा हिन्दी में कार्य करने का प्रचलन बढेगा।
7)      देश के अन्य भागों और भाषा-भाषियों को दोष दोने के बजाय यदि हिन्दी भाषी लोग, हिन्दीभाषी प्रदेशों की सरकारें, केन्द्रीय कार्यलयों के हिन्दीभाषी अधिकारी-कर्मचारी ही हिन्दी के प्रयोग और प्रचार-प्रसार पूरी ईमानदारी से करेँ तो शेष लोग भी वैसा ही करने लगेंगे।
8)      यदि आपको यह लगता है कि हिन्दी के साथ षडयंत्र हो रहा है तो आप ईमानदारी से यह परखें कि आप किस हद तक इसमें शामिल नहीं हैं। क्या आपको किसी ने किसी स्तर पर रोक रखा है, यदि नहीं तो आप क्यों नहीं इसका प्रयोग करते हैं । आप सरल हिन्दी का अत्यधिक प्रयोग कर किसी भी षडयंत्र को निष्प्रभावी कर सकते हैं।
       प्रत्येक व्यक्ति जो हिन्दी से प्रेम करता है, जो हिन्दी की दयनीय स्थिति से दुखी है, जो हिन्दी को राष्ट्रभाषा का सम्मानीय स्थान दिलाना चाहता है, उन्हें उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुये कार्य करते रहना चाहिये। हर हिन्दी प्रेमी व्यक्ति को अपने जैसे समान विचार वाले व्यक्तियों के साथ थोडे समयंतराल पर उपरोक्त के संबंध में चर्चा करते रहना चाहिये जिससे कि राष्ट्र भाषा के प्रति सक्रियता कम न हो। आज का समय अर्थ युग है, अतः हर हिन्दी प्रेमी को अपने पसंद अनुसार एक या एक से अधिक पुस्तकें खरीदते रहना चाहिये। इससे लेखकों एवं प्रकाशकों का मनोबल बना रहेगा और अच्छी रचनाओं की संख्या में बढोतरी होगी। कार्यालयों में कार्य करने वाले अधिकारी- कर्मचारी पर दायित्व अधिक है, उन्हें अपने अंदर की हीन भावनाओं से मुक्त होकर विश्वास के साथ कार्य करने की आवश्यकता है। सरल भाषा में अधिक से अधिक कार्य कर भाषा की राजनिति कर लाभ उठानेवाले राजनितिज्ञों को प्रभावहीन किया जा सकता है। आज के बाजारवादी युग में भाषा का अत्यधिक महत्व है। उत्पाद बेचने के लिये अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां भी ऐसी भाषा चुनती हैं जिसके माध्यम से अधिक से अधिक उपभोक्ताओं तक संपर्क बनाया जा सके। हम सभी जानते हैं कि बोलने वालों की सर्वाधिक संख्या के आधार पर हिन्दी विश्व की तिसरी भाषा है। ऐसे में प्राक्रतिक रुप से हिन्दी के लिये आधार तैयार है। जरुरत बस इतना है कि आप सभी अपने संकल्प पर खडा उतरे और हिन्दी को उस ऊंचाई तक ले चले जिसका वह हकदार है।